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Tuesday, May 17, 2016

एक वोह दिन था जब आए थे

एक वोह दिन था जब आए थे,
कितने भोले भाले से हम थे।
घबराए से तब हम थे,
बहकाए से तब हम थे।


फुसफुसा कर बातें करते थे,
सर झुकाकर चलते थे।
छुट्टियों में थे कुछ मुस्कुराए,
हाँ! फ्रेशर्स मैं चिल्लाए थे।


तब आगे के बेंचों की होड़ थी,
और असाइनमेंट्स की जोर थी,
कैसे हाथ खड़े कर देते थे,
अटेंडेंस पर मर देते थे।


वोह सीनियर्स की तीखी नजरें,
और उस पर सी●एस● की काजल के नखरे,
वोह ड्यू-डेट से पहले असाइनमेंट देना,
और viva मे चुप रहना।


एक वोह दिन था जब आए थे,
कितने भोले भाले से हम थे।
घबराए से तब हम थे,
बहकाए से तब हम थे।


वोह रिजल्ट से एक रात पहले दर मे पीना,
और वोह रिजल्ट की रात गम मे पीना,
वोह दोस्तों के आल-क्लियर होने से जलना,
पर अब करना भी तोह क्या करना।


खैर सेकंड इयर मे गए हम,
सीनियर्स भी कहलाए हम।
सुना है सी●एस● मे नई काजल आई है,
भाई, तभी तोह सुबह की सैर लगाई है।
वोह लव-अफेयर्स, वोह ब्रेक-अप-
सब देख लिए हमने,
वोह कोर्रिडोर्स, वोह रूफ-टॉप्स-
सब हो लिए हमने।


एक वोह दिन था जब आए थे,
कितने भोले भाले से हम थे।
घबराए से तब हम थे,
बहकाए से तब हम थे।


जब हम कोर इंजीनियरिंग मे पहुचे तो थोड़े थक चुके थे,
बहनो से लैस, और कॉलेज मे तीन साल के हो चुके थे।
अब तोह हॉस्टल से फ्लैट ले चुके थे,
कॉउंट्री करके बाइक ले चुके थे।


खैर Y.B से बचे रहे, U.F.M से छुपे रहे,
थोडा सोने मे वयस्त रहे और उधारी से घिरे रहे।
VIVA मे सटासट बोले,
और सोच रहे थे स्टार्टअप खोलें।


अब तोह हाथ मे कॉपी लहराते थे,
और जीन्स मे कॉलेज जाते थे।
लेट नाईट मूवीज देखते थे,
और लेक्चर मे लेट हो जाते थे।


एक वोह दिन था जब आए थे,
कितने भोले भाले से हम थे।
घबराए से तब हम थे,
बहकाए से तब हम थे।


जा अंतिम चरण मे दाखिल हुए,
तोह बड़े जोशीले से हम थे।
टूर्नामेंट्स कई जीते थे,
सारे कॉलेज मे फेमस हम थे।


यारो की टोली हमे सब कहते थे,
एक रौबीला समां हम साथ लिए चलते थे।
अब तोह viva मे हम छाते थे,
आर्गुमेंट भी कर जाते थे।
बस कुछी दिनों मे अब सब बिछड जाएंगे,
नजाने फिर कब कहाँ मिल पाएंगे।
ऐसे सुनहरे प्यारे दिन,
अब कहाँ लौट कर आएँगे।


एक वोह दिन था जब आए थे,
कितने भोले भाले से हम थे।
घबराए से तब हम थे,
बहकाए से तब हम थे।


*इस कविता पर बनी विडियो: https://www.youtube.com/watch?v=9lExDVuzWuo

Monday, April 25, 2016

माँ तेरी याद में

माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था,
उन हसीन यादो पर, मैं छुप-छुप कर रोया था।
थोडा हस-हस कर रोया था,
थोडा सिसक-सिसक कर रोया था।
माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था।


कैसा वोह बचपन था,
जो नादानी से घिरा था,
चोट लगे तोह "माँ" कहता था,
डाँट पड़े तोह "माँ" कहता था।
थका हारा जब घर आता था,
तोह सबसे पहले "माँ" चिल्लाता था।


वोह पापा की मार से तुम ही तोह बचाती थी,
"हो गई गलती, अब छोड़ भी दो" कहकर, उनसे दूर कहीं ले जाती थी।
फिर कैसे मुझे प्यार से तुम समझाती थी,
उन आँसू भरी आँखों की, कैसे तुम पलभर मे नमी छिन ले जाती थी।


वोह पड़ोसियो के टोकने पर, तुम्हारा बीच मे आना,
और हर मुसीबत से तुम्हारा मुझे बचा लेजाना।
कभी कोई शीशी जो टूटी मुझसे,
तोह तुम्हारा दौड़ कर आ के मेरे हाथो को देखना।
वोह सुबह नाश्ते मे भूख से ज्यादा खिलाना,
और उसके उप्पर एक ग्लास दूध और पिलाना।
वोह बातो मे लगाकर, मेरी बीच की मांग मिटाना,
वोह कालर का बटन लगाना और कास कर टाई पहनाना।
और मेरे लाख मना करने पर भी,
वोह स्वेटर को कमर से मोड़ना।


माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था,
उन हसीन यादो पर, मैं छुप-छुप कर रोया था।
थोडा हस-हस कर रोया था,
थोडा सिसक-सिसक कर रोया था।
माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था।


कैसे खाना तुम छोड़ देती थी, जब चोट मुझे लगती थी,
उस भरी भोजनथाल को कैसे मेरे खातिर तुम ठुकरा देती थी।
आलू-टमाटर तोह तुम मुझसे बहुत कटवाती थी,
मगर कभी तुम काटने को प्याज मुझे न देती थी।
छुरे-करची और कद्दूकस तोह तुमने बहुत दिए थे छूने मुझको,
मगर कैसे उस बन्दूक पर मुझको हाथ भी लगाने न देती थी।


नहाते वक़्त आकर तुम मेरी पीठ रगड़ दिया करती थी,
वोह दूरदर्शन और केबल तुम मुझसे सही करवाती थी,
विश्वास तोह करती थी तुम मुझपर,
फिर बाइक मे संग बैठने से क्यों डरती थी?
कहती थी मैं हूँ तुम्हारा लाडला,
फिर मेरी चीजे बहना को क्यों दे देति थी?


वोह बोर्ड्स मे तुम खुद रात रात भर जागती थी,
पर भाग जाती थी नींद जब तोह "आ सोजा" कह देती थी।
सुबह जल्दी उठाकर फिर कहती थी "चल पढ ले अब"
तिलक लगा कर भेजती थी और दही-चीनी खिलाती थी।
वोह मेरी 60 परसेंट को भी कैसे तुम 90 बतलाती थी,
कोई आँख उठा कर जो देखे मुझे तोह, उससे तुम चीड़ जाती थी।


उस रोडवेज की बस मे तुम कितने धक्के खिलाती थी,
मगर हो जाए कभी उलटी तोह, तुम बिना रुके पीठ सहलाती थी।
माँ हाजमोला तुम खिलाती थी,
और हिंगोली चबवाती थी।
कैसे भरी गर्मी से मैं आता था तोह,
तुम रूहअफजा पिलाती थी।


हर रात ब्रश करवाती थी और नाखून बहार कटवाती थी,
जो अँधेरा कर दू मैं खेल खेल मे, तोह बुलाने चली आती थी।
माँ शक्तिमान तोह देखने देती थी तुम, पर आहट बंद कर जाती थी।
माँ तुम सन्डे को भी जबरदस्ती नहलवती थी।


माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था,
उन हसीन यादो पर, मैं छुप-छुप कर रोया था।
थोडा हस-हस कर रोया था,
थोडा सिसक-सिसक कर रोया था।
माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था।


जिस दिन कॉलेज को मैं गया था, कैसे उदासी मे तुम मुस्कुराई थी,
पहले ही सन्डे को तुमने मेरे घर आने की सिफारिश लगाई थी।
कैसे जब मै घर आता था तोह तुम गोद मे सर रख कर सहलाती थी,
दिन भर मे चार भोज खिलाती थी, और "तेरी भूख ही मर गई" कह जाती थी।


याद आती है माँ अब तुम्हारी इन अनजान दीवारो के बीच बैठ कर,
यहाँ जाली रोटियां देख कर, और तुम्हारा रखा आचार खा कर।
तुम्हारे हाथ क मुलायम पराठे अब नसीब होते भी नही,
जो लात मार कर रजाई फेक दू रात मे, तोह कोई वापस उडाता भी नहीं।


माँ फ़ोन पर बात करते हुए आँखे बंद कर, तुम्हे अपने पास बैठा हुआ सोचता हूँ,
जो याद बहुत आए तुम्हारी तोह तस्वीर देख कर रात काटता हूँ।
माँ, अब हस देता हु तुम्हारे उस पुराने गुस्से पर भी,
और चोट लगे कभी तोह याद मे तुम्हारी, पी लेता हूँ वोह कड़वा हल्दी वाला दूध भी।
आज चलते चलते उन पुरानी यादों मे मैं खोया था,
तुम्हारा ही ख्याल लेकर आज दिन मे मैं सोया था।


माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था,
उन हसीन यादो पर, मैं छुप-छुप कर रोया था।
थोडा हस-हस कर रोया था,
थोडा सिसक-सिसक कर रोया था।
माँ तेरी याद मे, आज मैं फिर रोया था।